युगवार्ता

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फिर ऑड़-ईवन का शिगूफा

09/10/2019

फिर ऑड़-ईवन का शिगूफा

एम के मिश्र

इस साल नवंबर में केजरीवाल सरकार ने दिल्ली की सड़कों पर फिर से सम-विषम अभियान चलाने की घोषणा कर दी है। केजरीवाल की इस घोषणा के कई राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं।

प्रदेश सरकार ने एक बार फिर प्रदूषण कम करने के नाम पर 4 नवंबर से 15 नवंबर, 2019 तक कारों के लिए सम-विषम (आॅड-ईवन) योजना लागू करने की घोषणा की है। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली आम आदमी पार्टी सरकार की यह तीसरी सम-विषम अभियान है।
दिल्ली में भारी प्रदूषण के चलते 2016 में 1 जनवरी से 9 जनवरी तक और 15 अप्रैल से 23 अप्रैल तक सम-विषम अभियान चलाया गया था। प्रदूषण विशेषज्ञों का मानना है कि इस अभियान से प्रदूषण पर ज्यादा असर नहीं हुआ, अलबत्ता सड़कों पर गाड़ियां कम होने से लोग परेशान रहे। देश भर में सड़कों का जाल बिछाने वाले केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने 13 सितंबर यानी केजरीवाल की घोषणा के दिन ही कहा कि दिल्ली में एक और रिंग रोड बन जाने से प्रदूषण वैसे ही कम हो रहा है। इस तरह की योजना की कोई जरूरत नहीं हैं। दिल्ली सरकार प्रदूषण नियंत्रण पर कुछ करती नहीं दिख रही है। सार्वजनिक परिवहन प्रणाली में सुधार से उलट बसों की संख्या लगातार घट रही है। सालों पहले सरकार ने 11 हजार बसों को चलाने का हलफनामा दिल्ली हाई कोर्ट में दे रखा था।
आज बसों की संख्या घटकर चार हजार से भी कम हो गई है। सरकार का दावा है कि अगले कुछ महीनों में चार हजार नई बसें दिल्ली की सड़कों पर दिखाई देगीं लेकिन ऐसे दावे काफी समय से किए जाते रहे हैं। पहली बार के सम-विषम में 6,768 और दूसरी बार 5,854 चालान काटे गए थे। यह अपने आप में यह साबित करने के लिए काफी था कि लोगों को न तो ठीक से विकल्प दिए गए थे और न ही उन्हें ठीक जानकारी दी गई थी। पहली बार तो स्कूलें बंद होने से स्कूल बसों का उपयोग यात्री ढोने के लिए किया गया, दूसरी बार निजी बसों को भी लगाया गया, लेकिन उसे ठीक से प्रचारित न करने के चलते वे बसें खाली रहीं। कहने के लिए सम-विषम वाहनों को बड़ी संख्या में लाने से रोकने के लिए लाया जाता है लेकिन वास्तव में यह केवल कारों को रोकने के लिए हो पाता है।
दिल्ली में पंजीकृत वाहनों की तादात एक करोड़ से ज्यादा है। उनमें दो पहिए वाहन 67 लाख से ज्यादा हैं। उन्हें सम-विषम में इस बार भी छूट दी गई है। व्यवसायिक वाहन पहले से ही सीएनजी से चलते हैं। करीब 24 लाख कारों को ही सम-विषम में रोका जाता है। उनमें से भी पिछली बार सीएनजी से चलने वाली चार लाख कारों को स्टीकर दिए गए थे। दिल्ली से बाहर के वाहनों को भी उसी हिसाब से चलाया जाता है। सारे प्रयास के बावजूद महज दस लाख वाहन दिन भर सड़कों पर कम दिखते हैं।
केजरीवाल ने भी दावा किया कि इससे 10-15 फीसद प्रदूषण कम होता है। दिल्ली कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष कहते हैं कि यह अभियान केवल लोकप्रियता हासिल करने और कुछ दिनों तक अखबार की सुर्खियां बटोरने के लिए किया जाता है। अगर सरकार वास्तव में गंभीर है, तो वह रिफाइनरियों पर दबाव डाल कर डीजल-पेट्रोल की गुणवत्ता सुधरवाया जाए। वहीं कार बनाने वाली कंपनियों पर बेहतर ईंजन बनाने के लिए दबाव डाला जाए। वर्षाें पहले राईड्स ने दिल्ली की सार्वजनिक परिवहन प्रणाली पर सर्वे किया था और जो सुझाव दिए थे उसमें प्रमुख था कि दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन प्रणाली ठीक करने के लिए कई तरह की प्रणाली चलाई जाए।
बसों को बेहतर किया जाए। बसो, मेट्रो रेल के अलावा मोनो रेल, रिंग रेल, इलेक्ट्रिक ट्राली को अलग-अलग कोरिडोर पर चलाया जाए, लेकिन उसे एक दूसरे से इंटर लिंक किया जाए। मेट्रो तो अपनी रμतार से चल रही है और हर रोज 27 से 28 लाख यात्री उसमें सफर कर रहे हैं। जो केजरीवाल सरकार प्रदूषण कम करने का दावा कर रही है और सम विषम चला रही है, वही सरकार मेट्रो के चौथे चरण की मंजूरी देने में महीनों लगाए।
दिल्ली की मुख्य परिवहन प्रणाली बस हुआ करती है। बसों की संख्या बढ़ने के बजाए घट रही है। परिणाम यह हुआ है कि कुछ साल पहले दिल्ली में बसों से चलने वालों की तादात 60 फीसद थी, वह घट कर 20 फीसद रह गई है। तीसरी बार सम-विषम लाने वाली केजरीवाल सरकार सार्वजनिक परिवहन प्रणाली को ठीक करने के लिए कोई प्रयास करती नहीं दिख रही है। सरकार की इस सम-विषम योजना को केजरीवाल के एक चुनावी मुद्दा की तरह माना जा रहा है, जिससे दिल्ली का भला हो न हो लोगों की परेशानी बढ़ने वाली है।


 
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