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‘शाह रग’ के बिना पाकिस्तान!

02/11/2019

‘शाह रग’ के बिना पाकिस्तान!


कायद-ए-आजम मोहम्मद अली जिन्ना कश्मीर को पाकिस्तान की ‘शाह रग’ या ‘जुगलर वेन’ कहा करते थे। उनके लिए कश्मीर को ‘शाह रग’ की संज्ञा देने का तात्पर्य यह था कि कश्मीर के बगैर पाकिस्तान के अस्तित्व पर हमेशा संकट बरकरार रहेगा। शायद यही वजह थी कि पिछले सात दशक से अधिक समय में पाकिस्तान ने इसे अनाधिकृत रूप से हथियाने के लिए तरह-तरह के उपाय किए। सबसे पहले कबायलियों और उनके भेष में पाकिस्तानी सेना के जवानों द्वारा महाराजा हरि सिंह, जो अगस्त 1947 से अक्टूबर 1947 के बीच जम्मू-कश्मीर के आधिकारिक शासक थे, से जबरन इस क्षेत्र का स्वामित्व हड़पने का प्रयास किया। यह प्रयास आंशिक रूप से सफल भी रहा। गौरतलब है कि महाराजा हरि सिंह द्वारा ‘इंस्ट्रूमेंट आॅफ एक्सेशन’ पर हस्ताक्षर कर भारत में विलय से पहले पाकिस्तान ने जम्मू- कश्मीर के बड़े हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया था।

पाकिस्तान ने संभवत: बदलती हुई भू-राजनीतिक और भू-रणनीतिक परिस्थितियों का ठीक-ठीक आकलन नहीं किया और मामले को अधिक तूल देकर पाकिस्तानी लोगों की अपेक्षाएं इस कदर बढ़ा दीं कि अब नेताओं को अपने पैर वापस खींचने मेेंं परेशानियों का सामना करना पड़ रहा हैे।

भारत में विलय के उपरांत जब भारतीय सेनाओं ने कबायलियों और कबायलियों के भेष में पाकिस्तानी सेना को अपनी जवाबी कार्रवाई से पीछे हटाना शुरू किया, तो दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ गया। संयुक्तराष्ट्र संघ के तत्वावधान में हुए संघर्ष विराम के समय पाकिस्तान के कब्जे में कश्मीर का कुछ हिस्सा रह गया था, जिसे अब भारत में पी.ओ.के. और पाकिस्तान में ‘आजाद कश्मीर’के नाम से जाना जाता हैे। सन 1947 से लेकर अब तक पाकिस्तान ने इस रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र को अपना हिस्सा बनाने के लिए अपने तरकश के सभी तीरों-कूटनीति, अंतरराष्ट्रीयकरण, ताकतवर राष्ट्रों द्वारा मध्यस्थता, प्रत्यक्ष युद्ध, और आतंकवाद-का बारी-बारी से प्रयोग किया। सीमा पर से जारी आतंकवाद और अप्रत्यक्ष युद्ध से भारत हमेशा से ही दो-चार होता रहा है, लेकिन हाल ही में जब भारत ने संविधान की धारा 370 में संशोधन करते हुए जम्मू-कश्मीर राज्य के विशेष दर्जे को समाप्त कर उसे दो अलग-अलग केंद्रशासित राज्यों में विभाजित करने का फैसला किया तो पाकिस्तान आपे से बाहर होता नजर आया। पाकिस्तान में राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व ने इस बात की कभी कल्पना नहीं की थी और इसी कारण इस परिस्थिति से निपटने के लिए उनके पास किसी ठोस रणनीति का अभाव था। शायद यही कारण है कि पाकिस्तान द्वारा उठाए गए कदमों में किसी भी तरह का कोई ताल-मेल नहीं था। कभी वह मामले के अंतरराष्ट्रीयकरण करने के लिए प्रयासरत दिखा, तो कभी अमेरिका को इसमें मध्यस्थता करने के लिए मनाता दिखा, तो कभी परमाणु युद्ध की धमकी देता प्रतीत हुआ।

ऐतिहासिक रूप से कश्मीर का इस्तेमाल पाकिस्तान ने अपनी घरेलू राजनीति में एक भावनात्मक मुद्दे के रूप में किया है। पाकिस्तान की सेना ने भी कश्मीर और भारत से खतरे के नाम पर देश के संसाधनों का बेतरतीब प्रयोग किया है। अब पाकिस्तान के अंदर से ही देश के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व और उनकी काबिलियत पर सवाल खड़े किए जाने लगे हैं,जिनका कोई माकूल जवाब अभी तक उपलब्ध नहीं हैे। अभी हाल ही में जब जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जे. के.एल.एफ.) ने लाइन आॅफ कंट्रोल (एल. ओ.सी.) तक जुलूस निकालने की घोषणा की। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि वह लोगों को एल.ओ.सी. तक नहीं जाने देंगे और यह भी कहा कि ऐसा करना भारत के हाथों में खेलने जैसा होगा। जे.के.एल.एफ. ने इसे ‘आजादी जुलूस’ कहा और हजारों लोगों को लेकर एल.ओ.सी. की और कूच किया। इस जुलूस की एक खास बात यह रही कि इसमें पूर्व की भांति ‘कश्मीर बनेगा पाकिस्तान’ के बजाए ‘कश्मीर बनेगा खुदमुख्तार’ के नारे लगे।

एल.ओ.सी. की ओर बढ़ते इस जुलूस को श्रीनगर-मुजμफराबाद हाइवे पर जिसकूल नामक जगह पर बंदूकधारी पुलिस के जवानों ने रोक दिया। इधर बीच पाकिस्तानी नेशनल असेम्बली की मानवाधिकार पर स्टैंडिंग कमेटी के अध्यक्ष और विपक्षी नेता बिलावल भुट्टो जरदारी ने पाकिस्तानी सरकार को सीरिया और ईराक की तर्ज पर ‘मानवतावादी गलियारा’ (ह्ूमैनिटेरियन कॉरिडोर) बनाने के लिए प्रयास करने के लिए कहा है। पाकिस्तानी राजनेताओं को अब स्थिति से निपटने का कोई समाधान नजर नहीं आ रहा है। इसके पीछे प्रमुख कारण प्रारंभ से ही जम्मू-कश्मीर में भारत द्वारा किए गए बदलाव पर उनका जरूरत से ज्यादा कड़ी प्रतिक्रिया देना है।


 
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