युगवार्ता

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कानूनी घेरे में शरद पवार

09/10/2019

कानूनी घेरे में शरद पवार

अवधेश कुमार

महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव है और राज्य में विपक्ष के कद्दावर नेता शरद पवार कानूनी शिकंजे में आ गए हैं। मामला राजनीति से प्रेरित भी बताया जा रहा है।

महाराष्ट्र स्टेट कोआॅपरेटिव बैंक घोटाला में प्रवर्तन निदेशायल ने राकांपा के अध्यक्ष शरद पवार तथा उनके भतीजे और पूर्व मुख्यमंत्री अजीत पवार सहित बैंक के 70 पूर्व पदाधिकारियों के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग पर मुकदमा दर्ज किया है। इससे महाराष्ट्र की राजनीति में हंगामा मचा गया है। शरद पवार का नाम नहीं आता तो यह देशव्यापी चर्चा का विषय नहीं होता। अजीत पवार का नाम इस घोटाले में पहले से चल रहा था। प्रवर्तन निदेशालय ने अभी उनको नोटिस जारी नहीं किया है। इस समय महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव है, इसलिए आरोप लग रहे हैं कि पूरा मामला राजनीति से प्रेरित है। शरद पवार ने राजनीतिक तरीके से इसका जवाब देने की रणनीति भी अपनाई है।
पवार ने इस मामले को अपने पक्ष में राजनीतिक सहानुभूति पाने का हथियार बनाने की रणनीति भी अपनाई है। बॉम्बे उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र स्टेट कोआॅपरेटिव बैंक घोटाला मामले में न्यायालय में पेश किए गए तथ्यों के आधार पर शरद पवार और अन्य आरोपियों पर प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया था। न्यायमूर्ति एससी धर्माधिकारी और एसके शिंदे ने कहा था कि आरोपितों के खिलाफ ‘विश्वसनीय साक्ष्य’ हैं। यह करीब 25 हजार करोड़ का घोटाला है। क्या बिना किसी संलिप्तता के इतनी राशि हवा हो गई? राज्य की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) की शिकायत के आधार पर इस साल अगस्त में मुंबई पुलिस ने केस दर्ज किया था।
इसी आधार पर ईडी ने मनी लांड्रिंग का आरोप लगाया। एजेंसी ने कर्ज देने और अन्य प्रक्रिया में कथित अनियमितता की जांच के लिए मामला दर्ज किया है। इस प्राथमिकी में महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों के बैंक अधिकारियों को भी आरोपी बनाया गया है। पुलिस की प्राथमिकी के मुताबिक, जनवरी 2007 से 31 मार्च 2017 के बीच हुए महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक घोटाले के कारण सरकारी खजाने को करीब 25 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। यहां यह भी याद दिलाना जरूरी है कि महाराष्ट्र स्टेट कोआॅपरेटिव बैंक में अनियमितताओं के लिए शरद पवार के अलावा 75 राजनेताओं के खिलाफ नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवेलपमेंट यानी नाबार्ड ने जांच की थी।
नाबार्ड ने 2010 में अपनी जांच रिपोर्ट में इन्हें दोषी माना था। यह बात अलग है कि प्रदेश एवं केन्द्र दोनों जगह सरकार होने के कारण यह मामला जहां के तहां रुक गया। साफ है ईडी इस मामले में पवार और एमएससी बैंक में 2001 से 2017 के बीच रहे डायरेक्टरों और पदाधिकारियों सहित उन लोगों से पूछताछ कर सकता है, जिनके नाम एन्फोर्समेंट केस इंफर्मेशन रिपोर्ट में दर्ज हैं। यह सच है कि शरद पवार का जिक्र किसी भी रिपोर्ट में नहीं है लेकिन शिकायतकर्ता सुरिंदर अरोड़ा ने मुंबई पुलिस के सामने पेश अपने बयान में दावा किया था कि घोटाला शरद पवार के संरक्षण के बिना नहीं हो सकता था।
बयान उस प्राथमिकी का हिस्सा है जिसके आधार पर ईडी कार्रवाई कर रहा है। ऐसे में शरद पवार की भूमिका की भी जांच की जाएगी। अजित पर आरोप हैं कि एमएससी बैंक ने जो कर्ज आवंटित किए थे उनके लिए जमानत नहीं ली थी और कर्ज सब्सिडी वाली सस्ती दर पर दिया गया था। मुंबई पुलिस में दर्ज प्राथमिकी के मुताबिक कर्ज की पुनर्रचना इसलिए की गई थी कि उसमें कुछ निदेशकों का निजी हित था। कर्ज समिति ने नाबार्ड के क्रेडिट मॉनिटरिंग अरेंजमेंट का उल्लंघन करते हुए बड़े राजनेताओं की उन कोआॅपरेटिव चीनी मिलों को 2007-08, 2008-09 और 2010-11 में कम मार्जिन पर लोन आवंटित किया था जिनकी नेट वर्थ नकारात्मक थी।
इससे बैंक को 297.14 करोड़ रुपये का घाटा हुआ। पवार पर कोआॅपरेटिव शुगर फैक्टरियों को बेचने के मामले में अनियमितता के आरोप लगे हैं। आरोपों के मुताबिक कोआॅपरेटिव शुगर फैक्टरियों को कथित रूप से करीबी लोगों को रिजर्व प्राइस से कम दाम पर बेचा गया था। शरद पवार और उनके समर्थकों का यह तर्क अपनी जगह है कि वे न तो कोआॅपरेटिव बैंक के संस्थापक थे और न कोई पदधारी। किंतु इतने से किसी को पाक साफ होना साबित नहीं होता। राजनीतिक प्रभाव के कारण सबको मालूम था कि पवार परिवार की एमएससीबी में कितनी चलती थी।
ईडी के पास ज्यादातर ऐसे ही मामले आते हैं जिनमें आरोपी का सीधा कोई संबंध नहीं दिखता। जांच में यदि वे निर्दोष साबित होते हैं तो कोई उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकता। यदि उन्हें लगता है कि उनके खिलाफ मामला राजनीति से प्रेरित है, तो उन्हें सीधे उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय का रुख करना चाहिए।


 
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