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दिल्ली चुनाव और मीडिया कवरेज

07/03/2020

दिल्ली चुनाव और मीडिया कवरेज

मोहन सहाय

कई प्रमुख अंग्रेजी और हिंदी अखबारों ने एक साथ मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के साक्षात्कार के आधार पर एक
समाचार प्रमुखता से प्रकाशित किया। आगे के पन्नों में पूरा साक्षात्कार प्रकाशित किया गया। क्या इसे एक संयोग कहा जा सकता है कि लगभग एक जैसा ही साक्षात्कार प्रकाशित हुआ?

दिल्ली विधानसभा के चुनाव को जिन वजहों से याद रखा जाएगा, उनमें मीडिया कवरेज भी है। एक महीने से अधिक समय तक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने अपने कुल प्रसारण में 80 फीसदी से अधिक चुनावों का किया। उसकी तुलना में प्रिंट मीडिया इस दौरान राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय महत्व की खबर को देने के मामले में ज्यादा संतुलित नजर आया। याद रखना चाहिए कि दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश है और इसे पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिला है। इसके बावजूद इस बार जैसा उन्माद पहले कभी नहीं देखा गया। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाले फेक न्यूज को भी प्रमुखता के साथ उठाता रहा।
मैंने जो कुछ भी जाना और समझा, वह हतप्रभ करने वाला था। ऐसी आधारहीन और फर्जी खबरें लगातार पोस्ट की गईं, जिन पर भारतीय कानून के तहत आपराधिक मामला दायर किया जा सकता था। हालांकि इस तरह की फर्जी खबरों को प्रसारित करने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज नहीं किया गया। दिल्ली के चुनाव प्रचार में अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली आम आदमी पार्टी की सरकार के प्रदर्शन, नीतियों और उसके फैसलों पर चर्चा होनी चाहिए थी। शुरुआत में ऐसा हुआ भी, लेकिन जल्द ही इसका रुख नागरिकता संशोधन कानून, जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में हुई हिंसा, सीएए और एनआरसी विरोधी प्रदर्शन और शाहीन बाग की ओर मुड़ गया। ये सभी विषय तात्कालिक थे और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए घंटों तक डिबेट करने के लिए हॉट समझे जाने वाले विषय थे। यहां भी प्रिंट ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तुलना में इन खबरों को कम जगह दी। हालांकि चुनाव प्रचार के बीच ही एक विशेष उदाहरण भी है।
कई प्रमुख अंग्रेजी और हिंदी अखबारों का एक साथ अरविंद केजरीवाल का समाचार आगे के पन्नों में पूरा साक्षात्कार प्रकाशित करना क्या सिर्फ संयोग था? चुनाव के दौरान ही दिल्ली में धरना- प्रदर्शन का कवरेज चुनौती बना रहा। पत्रकारों को कंपकंपाती ठंड में भी लाइव कवरेज के लिए कई बार धरना प्रदर्शन से लोगों के चले जाने के बाद भी खड़ा रहना पड़ा। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कुछ संपादक भी मौके पर पहुंचे। इस दौरान प्रिंट मीडिया के कुछ वरिष्ठ पत्रकारों को पुलिस के बुरे बर्ताव का भी सामना करना पड़ा। इस चुनावी माहौल में शाहीन बाग के विरोध प्रदर्शन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जबरदस्त कवरेज से कई दूसरे देशों में भी चर्चा हुई।
शाहीन बाग में नागरिकता संशोधन कानून का विरोध करने के लिए मुस्लिम महिलाएं और बच्चे सड़क को पूरी तरह से जाम करके लगातार धरना दे रहे हैं। आमतौर पर ये प्रदर्शन शांतिपूर्ण ही रहा है। हालांकि प्रदर्शन के दौरान कई बार आपत्तिजनक नारे लगाने और झड़प की खबरें भी आई हैं। इन मुस्लिम महिलाओं और बच्चों का समर्थन करने के लिए कुछ सिख कार्यकर्ता भी शाहीन बाग पहुंचते रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि नागरिकता संशोधन कानून उनके खिलाफ है और एनआरसी से उनकी भारतीय नागरिकता खतरे में पड़ सकती है। इस गलत धारणा के कारण बहुत से मुसलमानों में डर की भावना उत्पन्न हुई और उसका प्रकटीकरण शाहीन बाग में हुआ। हालांकि ये मामला सर्वोच्च न्यायालय तक भी पहुंच चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह कई बार स्पष्ट कर चुके हैं कि नागरिकता संशोधन कानून मुसलमानों समेत किसी भी भारतीय नागरिक की मौजूदा स्थिति को प्रभावित करने वाला नहीं है। इसके बावजूद शाहीन बाग में प्रदर्शन जारी है।
मुझे लगता है कि प्रदर्शन के विशेष अंदाज में हो रहे मीडिया कवरेज को बहुत पहले ही रोक दिया जाना चाहिए था। केंद्र सरकार पहले ही यह स्पष्ट कर चुकी है कि नागरिकता संशोधन कानून को वापस नहीं लिया जाएगा। सच्चाई यही है कि शाहीन बाग में चल रहा प्रदर्शन टीवी न्यूज चैनल के लिए एक बढ़िया मसाला है। समय आ गया है कि इस आंदोलन को समाप्त किया जाए क्योंकि इसके पीछे निश्चित रूप से दिल्ली चुनाव को प्रभावित करने की भावना भी थी। अब तो चुनाव के नतीजे भी आ चुके हैं।



 
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