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राजनीतिक चश्मा और भावी खतरे

16/03/2020

राजनीतिक चश्मा और भावी खतरे

 उमेश चतुर्वेदी

नागरिकता संशोधन कानून को लेकर उठे बवंडर में इन पंक्तियों के लिखे जाने तक 39 बेशकीमती जिंदगियां निगल ली हैं। उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए 25 फरवरी को हुए दंगे और उसके बाद की प्रतिक्रिया में जिस तरह हिंसा हुई है, उसने 1984 के सिख विरोधी दंगों की याद दिला दी है। यह तो शुक्र है कि उत्तर पूर्वी दिल्ली का यह तनाव वहीं तक सीमित रहा, दूसरे इलाकों में नहीं गया। अव्वल तो ऐसे मौकों पर राजनीति नहीं होनी चाहिए, लेकिन जैसा अक्सर होता है, ऐसे मामलों पर राजनीति भी शुरू हो गई है। एक तरफ कांग्रेस है तो दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी। दिलचस्प बात यह है कि दंगों से महज 12 दिन पहले दिल्ली की सत्ता में दोबारा पहुंची आम आदमी पार्टी ने एक तरह से चुप्पी साध ली है। जैसा कि अरविंद केजरीवाल का अतीत का रवैया रहा है, उनके समर्थक सोच रहे होंगे कि वे केंद्र सरकार पर आक्रामक रवैया अख्तियार करेंगे। लेकिन गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद उन्होंने भी दंगों की रोकथ् ााम के लिए किए जा रहे पुलिस के उपाय को समर्थन ही दे दिया। इससे उनके समर्थक बौद्धिक हताश नजर आ रहे हैं।

दिल्ली हिंसा पर जिस तरह की राजनीति हो रही है वह भावी खतरे का संकेत है। आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी पर एक साथ हमला बोलकर और दोनों को एक खेमे में दिखाकर कांग्रेस और बौद्धिकों का एक वर्ग जहां आम आदमी पार्टी को ना सिर्फ साखहीन बनाने की कोशिश कर रहा है। बल्कि अल्पसंख्यक वर्ग सहानुभूति हासिल करके उस वर्ग में अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश में भी लगा है।

खासतौर पर वामपंथी बौद्धिकों ने तो सोशल मीडिया पर उन्हें भारतीय जनता पार्टी की बी टीम बताना शुरू कर दिया है। ऐसे मौके पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी मोर्चा ना संभालतीं तो हैरत ही होती। उन्होंने विपक्ष की ओर से मोर्चा संभाल लिया और 26 फरवरी को राजधानी की हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए गृहमंत्री अमित शाह का इस्तीफा मांग लिया। अगले ही दिन अपने लाव-लश्कर के साथ वे राष्ट्रपति भवन भी जा पहुंची और उन्होंने वहां भी सरकार पर जिम्मेदारी ना संभालने का आरोप लगाया। दिल्ली की हिंसा के लिए कांग्रेस आम आदमी पार्टी को भी जिम्मेदार ठहरा रही है। वैसे दिल्ली चुनावों के बाद पहला मौका है, जब कांग्रेस उस आम आदमी पार्टी के खिलाफ हमलावर नजर आ रही है, जिसको एक तरह से उसने दिल्ली के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी से सौतियाडाह के चक्कर में वाकओवर दे दिया था। उन्होंने सीधे तौर पर तो दिल्ली प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के नेता कपिल मिश्र पर आरोप तो नहीं लगाया, अलबत्ता सोशल मीडिया पर सक्रिय एक खास तबके और बौद्धिक विचारधारा के बौद्धिकों की उस मांग को परोक्ष समर्थन जरूर दिया, जिसमें हिंसा भड़काने के लिए कपिल को जिम्मेदार मानते हुए गिरμतार करने की मांग की जा रही है।

वैसे कपिल मिश्र इन सब आरोपों को खारिज करते हैं। उनका कहना है कि जाफराबाद मेट्रो स्टेशन पर महिलाओं द्वारा नागरिकता संशोधन कानून वापस लेने की मांग को लेकर की जा रही धरना के विरोध में प्रदर्शन किया था। कपिल का तर्क है कि उन्होंने कहा कि ऐसे धरनों से आम लोगों को परेशानी होगी। कपिल ने पुलिस और प्रशासन को चेतावनी दी थी कि अगर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दौरे के बाद भी धरना जारी रहा तो वे फिर लौटेंगे और धरना देने के खिलाफ धरना देंगे। सोनिया गांधी के आरोप के बाद भारतीय जनता पार्टी भी उन पर हमलावर हो गई है। भारतीय जनता पार्टी सोनिया गांधी के रामलीला मैदान में दिए उस भाषण की याद दिला रही है, जहां संविधान बचाओ रैली में उन्होंने लोगों से अपील की थी कि अगर वे घरों से नहीं निकले तो संविधान नहीं बचेगा। उन्होंने संविधान बचाने के लिए आर या पार करने की अपील की थी।

सोनिया गांधी के आरोपों में दम तब नजर आने लगा था, जब एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने चुनावों के दौरान भारतीय जनता पार्टी के दो नेताओं प्रवेश वर्मा और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर के साथ ही कपिल मिश्र के खिलाफ भड़काऊ भाषण देने के मामले में केस ना दर्ज करने के लिए दिल्ली पुलिस की खिंचाई की थी। दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा इस मामले में ऐसे ही आरोपी जमीयत ए इस्लामी नेता वारिस पठान, सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी द्वारा दिए गए भाषणों पर ध्यान ना देने पर विवाद हुआ। यह बात और है कि 28 फरवरी को दिल्ली हाईकोर्ट ने इन नेताओं के भाषणों का भी संज्ञान लिया। जिस पर दिल्ली सरकार, पुलिस और केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। बहरहाल आम आदमी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी पर एक साथ हमला बोलकर और दोनों को एक खेमे में दिखाकर कांग्रेस और बौद्धिकों का एक वर्ग जहां आम आदमी पार्टी को ना सिर्फ साखहीन बनाने की कोशिश कर रहे हैं, बल्कि अल्पसंख्यक वर्ग सहानुभूति हासिल करके उस वर्ग में अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

दंगे को आमतौर पर सांप्रदायिकता के बु िनयादी आधार पर ही देखा जाता रहा है। लेकिन इसके मूल में राजनीति भी अहम मुद्दा रही है। हकीकत यह है कि दिल्ली के इस दंगे के पीछे भी राजनीतिक महत्वाकांक्षा बड़ी वजह रही है। जिस तरह आम आदमी पार्टी के एक पार्षद ताहिर हुसैन पर खुफिया ब्यूरो के कर्मचारी अंकित शर्मा की हत्या कराने का आरोप लगा है या फिर उनके घर की छत पर पेट्रोल बम, पत्थर और दूसरे हथियार मिले हैं, उससे पहली नजर में यही लगता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत दौरे के ऐन मौके पर पूरी तैयारी के साथ दिल्ली को दहलाया गया। कुछ अंग्रेजी अखबारों में आई खबरों के मुताबिक हाल के दिनों में उभरे पीएफआई के नाम भी इन दंगों में शामिल है। इसके कुछ सक्रिय कार्यकर्ता गिरμतार भी किए गए हैं। अपने देश में प्रगतिशील विचारधारा के समर्थकों का एक वर्ग ऐसा है, जो दुनिया की हर बिगड़ी हालत के लिए अमेरिका और उसकी नी-ि तयों को ही जिम्मेदार ठहराता है। अमेरिका के साथ किसी भी देश का संबंध बेहतर होता है तो वह भी इन बौद्धिकों को असहज करता है। लेकिन यह उलटबांसी ही कही जाएगी कि उन्हें अपने आंदोलन चलाने के लिए फंड अमेरिकी और यूरोपीय एजेंसियों से ही मिलता है।

वे खुद की प्रतिष्ठा तभी मानते हैं, जब उन्हें किसी अमेरिकी संस्थान या विश्वविद्यालय से मान्यता मिलती है। इतना ही नहीं, दुश्मन विचारधारा वाले अमेरिका से ही अगर भारत के किसी नेता को अपमान मिलता है तो उसको वे जल्दी ही मान लेते हैं और इसका ढिंढोरा पीटते हैं। सूत्रों का दावा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ऐन दौरे के वक्त दिल्ली को दहलाकर देश के एक खास बौद्धिक वर्ग की इच्छा भारतीय प्रधानमंत्री और सरकार की छवि को खराब करना था। उनकी कोशिश ट्रंप के मुंह से भारत सरकार के खिलाफ कुछ बोलवाना था। यह बात और है कि ट्रंप ने इस हिंसा पर अपनी जुबान तक नहीं खोली। बाबा साहब अंबेडकर सांप्रदायिकता के विरोधी रहे। इस्लामी सांप्रदायिकता पर भी उन्होंने खुलकर कलम चलाई है। लेकिन हाल के दिनों में भारतीय जनता पार्टी के उभार को रोकने के लिए एक नया समीकरण बनाने की बौद्धिक और राजनीतिक कोशिश हो रही है।

भीम-मीम यानी दलित-मुस्लिम गठजोड़ के पैरवीकार यूं तो भाजपा विरोधी तमाम बौद्धिक खेमे और राजनीतिक दल हैं, लेकिन इसके प्रमुख सिद्धांतकार के तौर पर भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर उभरे हैं। कुछ सूत्रों का कहना है कि दिल्ली की हिंसा के पीछे एक हद तक इस विचारधारा और भीम आर्मी की भूमिका संदिग्ध है। दिल्ली दहलाने की कोशिश किसने की और उनका मकसद क्या था, यह तो जांच के बाद सामने आ ही जाएगा। दिल्ली पुलिस के उपायुक्त स्तर के अधिकारियों के नेतृत्व में दो विशेष जांच टीमें यह जांच कर रही हैं। लेकिन यह तय मानिए कि अगर प्रगतिवादी खेमा द्वारा फैलाए नैरेटिव के मुताबिक जांच रिपोर्ट नहीं आई तो इस रिपोर्ट को ही खारिज करने का दौर शुरू होगा और वह भविष्य में भी नए तनाव का कारण बनेगा।


 
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