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यूं ही नहीं है फारुक अब्दुल्ला की चुप्पी

02/11/2019

यूं ही नहीं है फारुक अब्दुल्ला की चुप्पी

डॉ. प्रभात ओझा

माम विषम परिस्थितियों के बीच कोई छोटी सी बात ऐसी होती है, जिसे अच्छे संकेत के रूप में लिया जाना चाहिए। जम्मू में कतिपय डॉक्टर, वकील और अन्य बुद्धिजीवियों ने सितंबर समाप्त होने के पहले एक नया राष्ट्रवादी दल बनाया। नये दल ‘जम्मू-कश्मीर पॉलिटिकल मूवमेंट’ का मानना है कि उनका और पूरे राज्य का भविष्य भारत के साथ ही जुड़ा हुआ है। दल का दावा है कि उसके पास 25 हजार कार्यकर्ता हैं और नयी पार्टी राज्य के चुनावों में हिस्सा लेगी। तब स्पष्ट नहीं हो पाया कि जम्मू-कश्मीर पॉलिटिकल मूवमेंट ब्लॉक विकास परिषद (बीडीसी) के चुनाव में क्या भूमिका निभायेगा। उसके उलट राज्य के एक प्रमुख दल एनसीपी ने इन चुनावों से अलग रहने का फैसला किया। सवाल है कि नये दल के गठन सम्बंधी छोटी बात अच्छे संकेत कैसे दे गयी? महबूबा मुμती की पार्टी पीडीपी ने तो इन चुनावों से अलग रहने का फैसला कर लिया है। फारुक अब्दुल्ला की एनसीपी भी अब वही कर रही है। फिर तो दोनों ही दल कुछ अच्छा करते नहीं दिख रहे। इसका जवाब दो सप्ताह के अंदर ही एक प्रमुख घटनाक्रम दे गया। राज्य प्रशासन ने नजरबंद और जेलों में बंद राजनीतिक नेताओं से उनके कार्यकर्ताओं को मिलने की छूट दे दी। जिस एनसीपी ने इस छूट के तहत नेताओं की बैठक के बाद चुनाव से अलग रहने का फैसला किया, सूत्र बताते हैं कि आगे के लिए वह भी अपने रवैये में नरमी लाने जा रही है।

जम्मू-कश्मीर में सामान्य होते हालात के बीच राजनीतिक दलों के नेताओं की रिहाई बहुत कुछ कहती है। नेशनल कांफ्रेंस ने तो 370 और 35-ए पर चुप्पी ही साध ली है। वह अब पूर्ण राज्य की बहाली के लिए लड़ेगी और केंद्रीय गृह मंत्री ने भी साफ कर दिया है कि जम्मू-कश्मीर के केंद्रशासित प्रदेश वाली स्थिति स्थायी नहीं है।

एनसीपी की नरमी के संकेत खुद पार्टी अध्यक्ष फारुक अब्दुल्ला के हाव-भाव से मिले। पार्टी सांसद हसनैन मसूदी के नेतृत्व में नेशनल कांफ्रेंस के 15 सदस्यीय दल ने गुपकार रोड पर जब पूर्व मुख्यमंत्री से मुलाकात की, वे न केवल पार्टी नेताओं के साथ खुश नजर आये, वरन अपनी पत्नी मोली के साथ भी उन्होंने फोटो खिंचवाई। यह दो महीने पहले की उनकी तस्वीर से बिल्कुल अलग नजारा था,जिसमें फारुक थके हुए नजर आ रहे थे। तब टीवी चैनल से बात करते हुए उनकी आंखों में आंसू तक आ गये थे। इस बार जो अधिक गौर करने वाली बात थी, वह यह कि सांसद मसूदी और मोहम्मद अकबर लोन के साथ वाली तस्वीर में वे जीत के ‘वी’ निशान बनाते हुए दिखे। दरअसलए एनसीपी के प्रतिनिधिमंडल ने फारुक के अलावा उनके बेटे उमर अब्दुल्ला से भी उनकी नजरबंदी वाली जगह हरी निवास में मुलाकात की। ये मुलाकातें एक रणनीति का हिस्सा बतायी जा रही हैं। उसे इस मायने में देखा जाना चाहिए कि 370 और 35-ए पर दोनों नेताओं ने चुपी बनाये रखी। जो नेता मिलकर आये,वे भी इन मुद्दों पर मौन ही रहे। पार्टी सूत्र कहते हैं कि इन मसलों की जगह वह जम्मू-कश्मीर राज्य की फिर से बहाली के लिए लड़ेगी। पार्टी ने ये भांप लिया है कि राज्य की आवाम केंद्र सरकार के विकास के कदम से कदम मिलाकर चलना चाहती है। वह रोज-रोज के बंद के नारों और हिंसा से ऊब चुकी है। जम्मू-कश्मीर पॉलिटिकल मूवमेंट जैसे छोटे संगठन ही सही, राज्य में खाली राजनीतिक माहौल को भरने का दावा करने लगे। ऐसे में क्षेत्रीय पार्टियों को अपने अस्तित्व की भी लड़ाई लड़नी होगी।

वह अति उग्र होकर संभव नहीं होगा। यहीं सवाल हो सकता है कि राज्य की दूसरी बड़ी क्षेत्रीय पार्टी पीडीपी की नेता महबूबा मुμती भी एनसीपी के फारुक अब्दुल्ला वाले रास्ते पर क्यों नहीं चलतीं? एनसीपी जहां राज्य में शांतिपूर्ण आंदोलन की तैयारी कर रही है, वहीं पीडीपी ने सख्त रवैये के संकेत दिए हैं। राज्यपाल सतपाल मलिक ने प्रदेश में राजनीतिक गतिविधि बहाल करने के मकसद से नजरबंद पार्टी नेताओं को उनके अपने दल के लोगों से मुलाकात की छूट देने की घोषणा की। पहले एनसीपी और उसके अगले दिन पीडीपी नेताओं की मुलाकात तय थी। दो पूर्व मुख्यमंत्रियों, पिता-पुत्र फारुक और उमर अब्दुल्ला ने इस कदम पर सकरात्मक रवैया अपनाया। दूसरी ओर वेद महाजन के नेतृत्व वाला पीडीपी प्रतिनिधिमंडल अपनी नेता महबूबा मुμती से मिलता, मुलाकात के ठीक पहले वाली रात पार्टी ने मुलाकात रद्द कर दी। इस बारे में सवाल किए जाने पर पार्टी महासचिव सुरिंदर चौधरी का कहना था,‘‘नेशनल कांफ्रेंस की बी टीम की तरह जरूरी नहीं कि हम हम उनके पीछे चलें।’’ अनुच्छेद-370 और 35-ए के खात्मे और जम्मू कश्मीर को दो हिस्सों में बांटने की घोषणा के बाद सामान्य स्थिति बनाये रखने के लिए अलगाववादी नेताओं को गिरμतार कर लिया गया था।

साथ ही राजनीतिक दलों के नेताओं को भी इस आधार पर नजरबंद किया गया कि उनके भाषण से राज्य में उत्तेजना फैल सकती है। कुछ दिन बाद प्रदेश में सब कुछ सामान्य रखने के लिए जरूरी था कि राजनीतिक गतिविधि बहाल की जाय। राज्य के हर क्षेत्र से कानून व्यवस्था को कोई दिक्कत नहीं होने की खबरें पहले ही आने लगी थीं। ऐसे में केंद्र सरकार और राज्यपाल के प्रतिनिधियों का नजरबंद नेताओं से संपर्क कर बात करना सहज हो गया। नेशनल कांफ्रेस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी राज्य के दो प्रमुख क्षेत्रीय दल हैं, जिनकी सूबे में अच्छी खासी दखल है। इन दलों से बातचीत सकारात्मक दिशा में थी। इसका प्रमाण आ रहे बयानों से चलने लगा। इस महीने की शुरुआत में गांधी जयंती के दिन जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सतपाल मलिक ने करीब दो महीने से नजरबंद या जेल में बंद सभी राजनेताओं को एक-एक कर रिहा करने की घोषणा की। तभी कई नेताओं की नजरबंदी हटा ली गई थी। उन्हें अपने घर अथवा नजरबंदी की जगह से जहां चाहें, जाने की छूट दे दी गयी। तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों फारुक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुμती के साथ जिन नेताओं की नजरबंदी खत्म कर दी गई, उनमें कांग्रेस के रमन भल्ला, विकार रसूल, नेशनल कांफ्रेंस के सज्जाद अहमद किचलू, सुरजीत सिंह सलाठिया और पैंथर्स पार्टी के हर्षदेव सिंह प्रमुख हैं। उधर, राज्यपाल के बाद वरिष्ठ भाजपा नेता राम माधव ने भी कहा कि जम्मू- कश्मीर के नजरबंद नेता जल्द ही ‘सामान्य’ रूप से राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा ले सकते हैं। राज्यपाल सतपाल मलिक और भाजपा नेता राम माधव के अतिरिक्त खुद गृह मंत्री अमित शाह का बयान बहुत महत्वपूर्ण है।

यह सिर्फ संयोग नहीं हो सकता कि फारुक और शाह के बयान एक ही दिन आये। जिस दिन फारुक अब्दुल्ला से मिलकर उनकी पार्टी के नेता 370 और 35-ए पर फारुक की चुप्पी का संकेत कर रहे थे, दिल्ली में गृह मंत्री ने यह बयान दिया। अमित शाह ने एक बार फिर जोर देकर कहा कि जम्मू-कश्मीर की केंद्र शासित प्रदेश की स्थिति स्थायी नहीं है। जल्द ही इसके पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल कर दिया जायेगा। फारुक अब्दुल्ला की पार्टी का रुख भी फिलहाल जम्मू-कश्मीर के पूर्ण राज्य का दर्जा हासिल करना ही है। इसमें बस एक फर्क रहेगा कि लद्दाख अलग केंद्र शासित प्रदेश बना रहेगा। महबूबा की सख्त रणनीति भी घाटी को लेकर ही बनी रहने की संभावना है। भाजपा के साथ सरकार चला चुकीं महबूबा कब तक उसके प्रति कठोर रहेंगी, सवाल इस पर भी है। वैसे भी केंद्र की सरकार और सत्तारूढ़ भाजपा जम्मू- कश्मीर पर अपने रुख में कोई ढील देने से रही। ऐसे में फिलहाल तो यही लगता है कि पहला मुद्दा राज्य में सामान्य स्थिति की बहाली का है। फारुक अब्दुल्ला की 370 और 35-ए की जगह पूर्ण राज्य के लिए लड़ने के संकेत से भी ज्यादा मुश्किल नहीं होने वाली है। तय है कि भले ये दल पंचायत चुनावों में हिस्सा न लें, राज्य विधानसभा के चुनाव से अपने को अलग नहीं रख पाएंगे। फालहाल तो उन्हें कैद अथना नजरबंदी से बाहर रखकर देश और देश से बाहर यह संकेत जायेगा ही कि केंद्र की सरकार जो कुछ भी कर रही है, वह राज्य के समुचित विकास के इरादे से ही है।



 
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