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शुभ घड़ी की आहट!

30/10/2019

शुभ घड़ी की आहट!

बद्रीनाथ वर्मा

राम जन्मभूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में लगातार 40 दिनों की सुनवाई पूरी होने के बाद अयोध्या में जिस तरह की हलचल बढ़ी है उससे क्या यह अंदाजा लगाना सही होगा कि वाकई बड़ी खुशखबरी मिलने वाली है और शुभ घड़ी नजदीक आ गई है? क्या फैसले के मद्देनजर ही धारा 144 लागू कर अफसरों की छुट्टियां रद्द कर उन्हें अपने मुख्यालय में बने रहने का निर्देश दिया गया है? क्या 500 साल पुराना यह विवाद समाधान की तरफ बढ़ चला है? इन्हीं सवालों व तमाम किंतु-परंतु को रेखांकित करती इस बार की आवरण कथा।

श्री राम जन्मभूमि विवाद पर लगातार 40 दिन चली सुनवाई पूरी होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। फैसला किसके पक्ष में आयेगा यह तो फिलहाल भविष्य के गर्भ में है लेकिन अयोध्या में 10 दिसंबर तक के लिए धारा 144 लगाये जाने व सभी पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की छुट्टियां 30 नवंबर तक रद्द कर उन्हें अपनेअपने मुख्यालय में बने रहने के निर्देश को लेकर अटकलों का बाजार गर्म हो गया है।
श्रीरामजन्मभूमि पर विराजमान रामलला के मुख्य पुजारी आचार्य सतेंद्र दास की सुरक्षा के लिए शासन की तरफ से गनर दिये जाने व यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड के चेयरमैन जफर अहमद फारुखी की सुरक्षा को खास तवज्जो दिये जाने से इन अटकलों को और अधिक बल मिला है। ऐसे में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के शब्दों में कहें तो क्या वाकई जल्दी ही बड़ी खुशखबरी मिलने वाली है? या फिर जिलाधिकारी अनुज कुमार झा की ओर से लगभग दो महीनों तक पूरे अयोध्या जनपद में धारा 144 लागू करने के पीछे मुख्य वजह दीपोत्सव, चेहल्लुम व कार्तिक मेला की सुरक्षा व्यवस्था है? जानकारों के मुताबिक सुरक्षा व्यवस्था की बात सही तो है लेकिन यह त्यौहारों के लिए नहीं, बल्कि राम मंदिर पर संभावित फैसले के ही मद्देनजर है।

इस तर्क में इसलिए दम दिखाई दे रहा है कि फैसला जिसके भी खिलाफ आयेगा वह जरूर कुछ न कुछ उधम मचाने की कोशिश करेगा इसलिए किसी भी तरह की अप्रिय घटना से निवटने के लिये ही सुरक्षा व्यवस्था को चाक चौबंद किया जा रहा है। खैर, यह दावे के साथ तो नहीं कहा जा सकता कि एक महीने से भी कम समय में आने वाला फैसला राम जन्मभूमि के पक्ष में ही आएगा लेकिन राम मंदिर के पक्ष में दिये गये प्रमाण व दलीलों से पलड़ा हिंदू पक्ष की ओर झुकता नजर आ रहा है। मंदिर आंदोलन से लंबे अरसे से जुड़े एक बड़े महंत का यह कहना कि इंतजार की घड़ी अब खत्म हो रही है। कम से कम बेवजह तो नहीं हो सकती।
मंदिर समर्थकों की उम्मीदों को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक बयान ने भी पंख लगा दिये। दरअसल, योगी ने गोरखपुर में मोरारी बापू की रामकथा में बड़ी खुशखबरी आने की बात कही। हालांकि बड़ी खुशखबरी की बात करते हुए योगी ने न तो अयोध्या का नाम लिया था और न ही श्रीराम जन्मभूमि का। लेकिन जिस तरह से रामकथा के दौरान उन्होंने यह बात कही थी उसका तात्पर्य लोगों ने यही लगाया। यही नहीं, जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास ने भी कहा है कि शुभ घड़ी आ गई है। उम्मीद है कि रामायण मेले से पहले मंदिर निर्माण का कार्य शुरू हो जाएगा। उल्लेखनीय है कि अयोध्या में 30 नवंबर से 3 दिसंबर तक रामायण मेले का आयोजन प्रस्तावित है और नृत्य गोपाल दास रामायण मेला समिति के अध्यक्ष हैं।
जाहिर है मुख्यमंत्री योगी और महंत नृत्य गोपाल दास के बयानों से रामभक्तों के मन में एक नई आस जगी है। उन्हें लगता है कि इस बार पांच जजों की संवैधानिक पीठ नीर क्षीर निर्णय देकर सदा सदा के लिए इस मामले का पटाक्षेप कर देगी। इस पीठ में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के अलावा, जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस अशोक भूषण, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एस अब्दुल नजीर शामिल हैं। मुख्य न्यायाधीश ने जिस तरह से राजनैतिक और सामाजिक रूप से संवेदनशील इस ऐतिहासिक मुकदमे की सुनवाई को लेकर समयसीमा तय की थी उससे माना जा रहा है कि इस पर 15 नवंबर तक कभी भी सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ सकता है।
ऐसा इसलिए क्योंकि मुख्य न्यायाधीश 17 नवंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। अगर 17 नवंबर तक अयोध्या मामले पर फैसला नहीं देते हैं तो फिर इस मामले की सुनवाई नये सिरे से एक नई बेंच के सामने होगी। हालांकि इसकी संभावना बेहद कम है। उल्लेखनीय है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 30 सितंबर 2010 को विवादित 2.77 एकड़ जमीन को सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला विराजमान के बीच बराबर-बराबर बांटने का आदेश दिया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में इस फैसले के खिलाफ 14 याचिकाएं दायर की गईं थीं। सुप्रीम कोर्ट ने मई 2011 में हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगाने के साथ विवादित स्थल पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया।
इसके बाद आपसी समझौते से समाधान कराने की सुप्रीम कोर्ट ने कोशिश की लेकिन बात नहीं बनी। इसके बाद 6 अगस्त से इन 14 अपीलों पर लगातार 40 दिनों तक सुनवाई कर कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। समयसीमा के अंदर सुनवाई पूरी करने के लिए संवैधानिक पीठ सप्ताह के पांचों दिन बैठी। इस पीठ में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के अलावा जस्टिस शरद अरविंद बोबड़े, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण तथा जस्टिस अब्दुल नजीर शामिल हैं। बहरहाल, तकरीबन 500 साल पुराने रामजन्मभूमि विवाद के हल होने का इंतजार करते-करते लगभग दो सदियां बीत चुकी हैं।

दोमंजिला होगा प्रस्तावित भव्य राममंदिर
श्रीरामजन्मभूमि पर विराजमान रामलला के मुख्य पुजारी आचार्य सतेन्द्र दास के मुताबिक अयोध्या में बनने वाला श्रीराम का मंदिर दो मंजिला होगा। इस भव्य मंदिर की लंबाई 268 फीट, चौड़ाई 140 फीट और ऊंचाई 128 फीट होगी। राम मंदिर में 212 स्तंभ होंगे, पहली मंजिल में 106 स्तंभ होंगे। राम मंदिर में सिंह द्वार, नृत्य मंडप, रंग मंडप, कोली, गर्भ गृह और परिक्रमा पथ शामिल होंगे। इसके साथ ही गर्भ गृह के चारों ओर बनने वाले परिक्रमा पथ की चौड़ाई 10 फीट होगी। इस भवन के भूतल पर भगवान राम बालरूप में यानी ‘रामलला’ के रूप में विराजमान होंगे तथा मंदिर के प्रथम तल पर राम दरबार होगा। फिलहाल अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के प्रस्तावित मंदिर मॉडल पर कार्यशाला में पत्थर तराशने का कार्य जारी है। राम मंदिर पर पक्ष में फैसला आने की उम्मीद के बाद राम जन्मभूमि, हनुमान गढ़ी, कनक भवन और सीता रसोई के साथ ही रामघाट स्थित मंदिर निर्माण कार्यशाला में प्रस्तावित राम मंदिर के मॉडल का दर्शन करने और मत्था टेकने बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।

तमाम उतार-चढ़ाव के बीच यह विवाद इतिहास के सबसे बड़े दंगों में से एक की वजह भी बना। बावजूद इसके अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण आज भी पूरे देश के लिए एक अहम मुद्दा बना हुआ है। यही वजह है कि पक्ष हो या विपक्ष सबने अयोध्या विवाद को अपने-अपने तरीके से भुनाया है। यह मुद्दा कितना जटिल है उसे इससे समझा जा सकता है कि इसने अंग्रजों के भी पसीने छुड़ा दिये थे। यानी जिस ब्रिटिश साम्राज्य में सूरज अस्त नहीं होता था वह भी इस विवाद को सुलझा पाने में नाकाम रहा था। खैर, मुस्लिम पक्ष के एक वर्ग के अंदर से उठने वाली यह आवाज कि अयोध्या में दावा छोड़कर भूमि हिंदुओं को सौंप दिया जाय।

कोर्ट जो फैसला देगा उसमें निश्चय ही एक की जीत और दूसरे की हार परिलक्षित होगी। ऐसे में अगर दोनों पक्ष मिलकर कोई समझौता कर पाते हैं तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए।

निश्चय ही यह पहल स्वागत योग्य है लेकिन मुस्लिम पक्ष की मांगों को देखते हुए अधिकतर लोगों का मानना है कि यह रपट पड़े तो हर गंगे वाली स्थिति है। चूंकि बाबरी के पैरोकारों के पैरों के नीचे से धरती खिसक चुकी है इसलिए वह अपनी नाक बचाने के लिए इस तरह की बातें कर रहे हैं। हालांकि अगर विवाद को सौहार्द्रपूर्ण तरीके से सुलझा लिया जाये तो इससे बेहतर कुछ भी नहीं हो सकता, क्योंकि कोर्ट जो फैसला देगा उसमें निश्चय ही एक की जीत और दूसरे की हार परिलक्षित होगी। ऐसे में अगर दोनों पक्ष मिलकर कोई समझौता कर पाते हैं तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए।


 
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