युगवार्ता

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रावण के गांव से

14/10/2019

रावण के गांव से

आशुतोष कुमार पाण्डेय

राम के देश में बिसरख एक ऐसा गांव है जहां के लोग रावण का पुतला जलाना अच्छा नहीं मानते हैं। इसका कारण कुछ और नहीं, दरअसल बिसरख रावण का जन्म स्थान है।

हर साल देश में दशहरे के दौरान रावण के अनगिनत पुतले जलाकर बुराई पर अच्छाई की विजय का पर्व मनाया जाता है। पर देश के एक हिस्से में रावण का पुतला जलाए जाने की न केवल मनाही है, बल्कि इस परंपरा को बुरा भी मानते आए हैं। यह जगह कोई और नहीं, रावण का जन्म स्थान बिसरख है। बिसरख गांव, ग्रेटर नोएडा, गौतमबुद्ध नगर में स्थित है। दशहरे के अवसर पर जब युगवार्ता की टीम ने इस गांव में दोपहर के बाद प्रवेश किया, तो यह गांव आम कस्बे की तरह ही लगा। पर यहां दिल्ली एनसीआर की झलक यानी विकास साफ दिख रहा था।
दूसरे शब्दों में कहें तो यह एक संपन्न और सुविधा पसंद लोगों का गांव लगा। गांव में प्रवेश करते ही राम के भक्तों को यह बात समझ नहीं आएगी कि यहां रावण नाम इतना लोकप्रिय क्यों है। इसका पता यहां के साइन बोर्ड खुद-ब-खुद बता रहे हैं। अपने व्यापारिक प्रतिष्ठानों के नाम के आगे-पीछे रावण शब्द यहां आमतौर पर प्रयोग होता दिख रहा है। यहां तक गांव में चल रही निजी गाड़ियों में भी आमतौर पर रावण शब्द लिखा हुआ दिखा। गांव में प्रवेश के साथ हम आश्वस्त हो रहे थे कि हम रावण के गांव में पहुंच गए हैं।
दुर्गा पूजा और दशहरे के इस त्योहार की बहुत सी धूमधाम यहां नजर नहीं आ रही है। वैसे भी हमारा लक्ष्य रावण का मंदिर है। ग्रामीणों से उसके बारे में पूछते हुए हम मंदिर की तरफ बढ़ रहे हैं। ग्रामीणों से बातचीत में एक बात हमें महसूस हुई कि उनमें रावण को लेकर एक गर्व की भावना है। उनका यहां तक मानना है कि रावण की शक्ति के कारण हमसे बाहरी गांव के लोग टक्कर नहीं ले सकते हैं। यानी रावण का प्रताप उनकी रक्षा करता है। बातचीत करते हुए हम इस गांव को लांघत हुए भगवान शिव के प्राचीन मंदिर तक पहुंचते हैं।
यही मंदिर ‘रावण मंदिर’ के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर के पुजारी पण्डित विनय भारद्वाज ने बातचीत के दौरान बताया कि रावण के पिता महर्षि विश्वश्रवा का आश्रम इसी जगह था और उन्होंने ही इस शिव मंदिर की स्थापना की थी। उन्होंने कहा कि रावण संहिता में इन बातों का प्रमाण भी मिलता है। पुजारी भारद्वाज ने बड़े आत्मविश्वास से बताया कि यहां से एक सुरंग गाजियाबाद के घंटाघर तक जाती थी। इसी मार्ग से रावण तपस्या के लिए वहां जाते थे। गाजियाबाद के भगवान शंकर मंदिर रावण द्वारा स्थापित किया गया था।


यहां स्थापित शिवलिंग अद्भुत है। इस शिवलिंग से कभी भी पानी नहीं सूखता। शिवलिंग को स्पर्श करते ही हाथ गीला हो जाता है। बिसरख गांव के निवासी चौधरी करण सिंह ने कहा कि रावण का जन्म इसी गांव में हुआ था। पहले इस गांव का नाम विश्रवा था। कालांतर में यह गांव बिसरख के नाम से पुकारा जाने लगा। रावण भी उनके परिवार के सदस्य जैसे हैं। उन्होंने कहा कि उनके पूरे गांव की आस्था भगवान राम में है और रावण को भी गांव परिवार का सदस्य मानते हैं। इसलिए यहां सदियों से रावण पुतला दहन की प्रथा नहीं रही है। गांव की प्राचीनता के बारे में बताते हुए करण सिंह ने कहा कि पुरातत्व विभाग ने 80 के दशक में यहां खुदाई कराई थी।


उस दौरान कुछ अवशेष व सोने के सिक्के मिले थे जिस पर चांद बना हुआ था। उन्होंने कहा कि देश के पूर्व प्रधानमंत्री रहे स्वर्गीय चंद्रशेखर को जब इस गांव के बारे में पता चला तो वो खुद को यहां आने से रोक नहीं पाए। उन्होंने रावण मंदिर जाकर भगवान शिव के मंदिर में पूजापाठ भी की थी। यह आश्चर्य की बात है कि यह मंदिर कहलाता तो रावण का मंदिर है पर यहां न तो रावण की कोई प्रतिमा है और न इस संदर्भ के कोई चिन्ह ही। बिसरख गांव के निवासी उपेन्द्र भाटी ने बताया कि कुछ वर्ष पहले ग्रामीणों ने शिव मंदिर प्रांगण में रावण प्रतिमा स्थापित करने की कोशिश की थी, लेकिन बजरंग दल सहित कुछ संगठनों ने मूर्ति को खंडित कर स्थापित करने से मना कर दिया।

‘गांव की आस्था भगवान राम में है और रावण को भी ग्रामीण परिवार का सदस्य मानते हैं। इसलिए सदियों से यहां रावण का पुतला दहन की प्रथा नहीं रही है।’

उन्होंने कहा कि ग्रामीण पुन: रावण प्रतिमा स्थापित करने की सोच रहे हैं। इसी गांव के युवक अरुण कुमार ने हमसे बातचीत में कहा कि युवा पीढ़ी भी रावण को अपने परिवार का सदस्य मानती है। अरुण ने कहा कि जब भी वो कहीं बाहर जाते हैं और यह बताते हैं कि वो रावण के गांव से हैं, तो लोग उनसे खूब हंसी-मजाक करते हैं और गांव के बारे में जानने की कोशिश करते हैं।
बिसरख गांव की एक महिला ने हमसे बातचीत में कहा कि रावण पुतले का दहन करने से गांव में अमंगल हो जाएगा। उन्होंने कहा कि वो राम की ही तरह रावण में भी आस्था रखती हैं, क्योंकि रावण इसी गांव का रहने वाला था। उन्होंने कहा कि किसी माता-पिता के लिए उनकी संतान जैसा भी हो प्रिय होती है। इसलिए उन्हें रावण दहन देखना पसंद नहीं है। रावण के गांव बिसरख के लोगों में रावण के प्रति जो भी श्रद्धा है उससे राम भक्त इत्तेफाक रखे या न रखे, पर बिसरख गांव की उस महिला की बात से हम सभी इत्तेफाक रखते है कि संतान चाहे जैसी हो, हमें प्रिय ही होती है।


 
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