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अपराध और प्राइवेसी की जंग

14/10/2019

अपराध और प्राइवेसी की जंग


प कहीं भी हों, भीड़ में या अकेले, दिन हो या रात हर समय कैमरा आप पर नजर रखने जा रहा है। हम बात कर रहे हैं ‘फेस रिकॉगनिशन तकनीक’ की। इस तकनीक से लैस कैमरे अब देश भर में लगाने की तैयारी है। हाल में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) ने फेस रिकॉगनिशन तकनीक यानी आॅटोमेटेड फेशियल रिकॉगनिशन सिस्टम (एएफआरएस) को बड़े पैमाने पर लाने के लिए टेंडर जारी किए हैं। फिलहाल इस सिस्टम की मौजूदा क्षमता एक करोड़ फोटो और वीडियो संरक्षित करने की होगी। इसे बाद में पांच करोड़ तक करने की योजना है। मकसद अपराधियों की धरपकड़ और अपराध की रोकथाम बताई जा रही है। बाजार के भीड़-भाड़ वाले इलाकों के बीच भी किसी ‘अपराधी’ को पहचाना जा सकता है और चंद सेकेंड के भीतर डाटाबेस से मिलान कर उसे धर-दबोचा जा सकता है। यहां तक तो सब ठीक नजर आता है लेकिन, पेंच भी है।

पहले कभी फिल्मों में हीरो चेहरा पढ़ने की बात करता था तो हीरोइन शरमा जाती थी। अक्सर इसके बाद गीत गूंजने लगता था। लेकिन, रोमांस की यह तस्वीर अब पूरी तरह बदलने वाली है। लोगों का चेहरा पढ़ने की जिम्मेदारी पुलिस निभाने जा रही है।

काबिलेगौर है कि अपराधी को पकड़ने से पहले यह तकनीक उस जगह से गुजरने वाले हर व्यक्ति की फोटो अपने कैमरे में कैद करेगा। फिर पहले से अपने डाटाबेस में मौजूद अपराधियों की फोटो से मिलान करेगा। दूसरे शब्दों में, एएफआरएस सबको ‘संभावित अपराधी’ मानता है। अपराधियों की फोटो से मिलान न होने पर ही कोई व्यक्ति निर्दोष साबित होगा। यानी आपको निर्दोष साबित करने में एएफआरएस की भूमिका बड़ी होगी। बस यही वह पहलू है, जिससे साइबर एक्सपटर््स सहमत नहीं हंै। विदुषी मर्दा का मानना है कि हर समय कैमरे की जद में रहने से आपको सुरक्षा का भ्रामक अहसास होता है। कैमरा आपके चेहरे की फोटो संरक्षित करता रहता है। लगातार नाक-नक्श की नापजोख करता रहता है। यह व्यक्ति की निजता का उल्लंघन है। उनके मुताबिक इस तकनीक की शुरुआत ही सबको संभावित अपराधी मानने से होती है। यह संविधान का भी उल्लंघन है क्योंकि कानून दोष सिद्ध होने तक सबको निर्दोष मानता है।

हाल में नागरिक अधिकारों के लिए कार्यरत ‘बिग ब्रदर वॉच’ ने अपने एक अध्ययन में पाया कि ब्रिटेन में फेस रिकॉगनिशन सिस्टम कामयाब नहीं हो सका। इसने पहचान में गलती की। साउथवेल्स पुलिस ने मई, 2017 से मार्च, 2018 के मध्य 2685 संदिग्ध लोगों की पहचान की थी। इनमें से 2451 नतीजे गलत निकले। यही नहीं मेट्रोपॉलिटन पुलिस ने भी लंदन के 2016 और 2017 के कार्निवाल तथा एक स्मृति सभा में 102 संदिग्ध लोगों की पहचान की। यह तकनीक फिर फेल साबित हुई। इनमें कोई भी अपराधी नहीं निकला। लीसेस्टरशायर पुलिस ने भी कुछ समय बाद इस तकनीक को अनुपयोगी बताते हुए इसका इस्तेमाल बंद कर दिया। सन् 2017 में चैंपियन लीग के कार्डिफ में हुए फाइलन मैच में कोई एक लाख सत्तर हजार दर्शक मौजूद थे। पुलिस ने इस दौरान इस तकनीक के जरिए 2470 संदिग्ध लोगों की पहचान की। लेकिन, यह तकनीक फिर फेल साबित हुई। इनमें से 2297 बेदाग थे। यानी 92 फीसदी नतीजे गलत थे। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस साल की शुरुआत में इस तकनीक की असफलता को लेकर दिल्ली पुलिस को आडेÞ हाथ लिया था। इस सॉμटवेयर के बावजूद पिछले तीन साल में गुमशुदा 5000 बच्चों का पता लगाने में यह सिस्टम असफल रहा। जस्टिस हीमा कोहली और जस्टिस मनोज कुमार ओहरी की पीठ ने जनवरी में कहा कि हमें यह बताया गया कि फेस रिकॉगनिशन सॉμटवेयर से गुमशुदा बच्चों की तलाश में कोई मदद नहीं मिली। यह आश्चर्यजनक है।

तकनीक को चिढ़ाता हांगकांग का प्रदर्शन

हांगकांग में पिछले दो माह से चीन की प्रत्यर्पण नीति के खिलाफ सड़कों पर प्रदर्शन जारी है। पिछले दिनों एयरपोर्ट पर भी विमानों की आवाजाही रुक गई थी। इस नीति के मुताबिक चीन में अपराध करने वाले व्यक्ति को हांगकांग से वापस चीन भेजा जाना है। हालांकि मुख्य कार्यकारी अधिकारी कैरी लैम ने विरोध के बाद इस बिल को लंबित कर दिया है। यह भी आश्वासन दिया कि प्रत्यर्पण की प्रक्रिया बोलने और प्रदर्शन के अधिकारों के मामलों में नहीं अपनाई जाएगी। लेकिन, प्रदर्शनकारी बिल के रद्द होने तक मानने को तैयार नहीं हैं। चीन यहां एएफआरएस के जरिए प्रदर्शनकारियों की पहचान करने की जी-तोड़ कोशिश कर रहा है। लेकिन, उन लोगों ने अनूठा तरीका अपनाया हुआ है। बड़े-बड़े चश्मे, फेस मास्क और कैप के जरिए वे लोग अपनी पहचान छिपा लेने में अब तक सफल हैं। यही नहीं बर्नर (बगैर इंटरनेट का बेसिक)फोन की मदद से आपस में संपर्क रखते हैं। प्रदर्शनकारियों ने स्मार्ट फोन का इस्तेमाल बंद कर दिया है। ट्रेन में कार्ड के स्थान पर टोकन भी एक तरफ का ले रहे हैं ताकि उनकी लोकेशन का पता न लग पाए। कैमरे को धता बताने के लिए लेजर लाइट का भी इस्तेमाल जारी है।

यह अस्वीकार्य है कि दिल्ली पुलिस का इतनी तैयारी के बाद बनाया गया सॉμटवेयर कोई ठोस नतीजा देने में नाकाम रहा। इस तकनीक की नाकामी के कारण अमेरिका में तो सैन फ्रांसिस्को ने इस तकनीक पर ही प्रतिबंध लगा दिया। एक बड़ा मसला निजता के साथ ही इसकी सटीकता का भी था। ऐसी स्थिति में भारत में इसे लगाने के लिए होड़ क्यों मची है? दिल्ली सरकार तो स्कूलों में भी सीसीटीवी कैमरे लगा रही है। मकसद बच्चों के साथ ही शिक्षकों के शिक्षण कार्य पर ही नजर रखना बताया जा रहा है। दिल्ली में कोई डेढ़ लाख सीसीटीवी कैमरे लगाने की तैयारी है। सवाल उठता है कि ऐसा करने से वाकई लोग सुरक्षित होते हैं या सिर्फ सुरक्षा का अहसास रहता है। देश में सबसे पहले फेसटीएजीआर. कॉम का इस्तेमाल चेन्नई में शुरू हुआ था। आईटी डेवलपर विजय नानादेसीकन ने इसकी उपयोगिता बताते हुए कहा था कि देश भर में पिछले पांच सालों में ढाई लाख बच्चे गुम हुए थे। उनका दावा है कि इनकी शिनाख्त में यह कारगर है।

चेन्नई के सर्वाधिक भीड़-भाड़ वाले व्यावसायिक इलाके टी नगर में तो पुलिस इसके जरिए संभावित अपराधियों पर नजर रख रही है। पुलिस का मानना है कि इसके प्रयोग के बाद इस क्षेत्र में अपराध की वारदात की संख्या एक तिहाई तक घट गई है। जहां पहले जेबकतरों या सामान चुराने वाले लोगों की गिरμतारी सप्ताह में 30-35 तक होती थी, वह अब दहाई के आंकड़े पर भी नहीं पहुंच पाती है। यह आंकड़ा हौसला देने वाला है। लेकिन, साइबर विशेषज्ञ हाल में ‘संदिग्ध लोगों’ की पहचान की कोशिश को उचित नहीं मानते हैं। साइबर कानून एडवोकेट गौतम भाटिया का सवाल है कि आखिर इसका पैमाना क्या है कि कोई व्यक्ति अपराध की नीयत से आया है? क्या सार्वजनिक स्थान पर देर तक खड़ा होना, खस्ताहाल स्थिति या ढंग के कपड़े न पहनना भी संदिग्ध की श्रेणी में ले आएगा? या विशेष परिधान, वेशभूषा को भी मानक माना जा सकता है? अपराधियों के प्रति पूर्व अवधारणा की कोई भूमिका हो सकती है? इस तकनीक की बड़ी खामी यह है कि यह सिर्फ गोरी चमड़ी वाले चेहरों की कुछ हद तक सही शिनाख्त कर पाने में सफल है।

चीन में एक वर्ग पर नजर

चीन आॅटोमेटेड फेस रिकॉगनिशन सिस्टम पर अर्से से काम कर रहा है। सड़कों पर कोई 17 करोड़ सीसीटीवी लगाए जा चुके हैं। इनकी तादाद जल्द ही दोगुनी करने की तैयारी है। सिनजियांग प्रांत में चीन इसके जरिए उईगुर मुस्लिम आबादी पर भी नजर रख रहा है। हर व्यक्ति की प्रोफाइलिंग की जा चुकी है। कौन व्यक्ति कब-कब बाहर निकलता है, कहां जाता है, किससे मिलता है -इन सबकी जानकारी का व्यापक डाटा बेस तैयार है। जिस व्यक्ति से मिलता है, उसके बारे में भी चीनी तंत्र पता करता रहता है। यह खुफियागिरी उसे हर व्यक्ति के बारे में हमेशा अपडेट रखती है। यही नहीं एएफआरएस के जरिए चीन लोगों के मनोभावों की भी निगरानी करता है। चेहरों की आकृति, रोष और गुस्से के भावों के अनुरूप इनसे निपटा जाता है। दूसरे शब्दों में, चीन पहले से ही भांप लेता है कि व्यक्ति का इरादा क्या है, वह क्या करने की सोच रहा है? घर से निकलते ही मंसूबों को ताड़ने की क्षमता इस तकनीक की खूबी बताई जाती है। बताया जाता है कि चीन इतना पारंगत हो चला है कि ऐसे लोगों की भी खोज खबर रखी जाती है जो कुछ समय से घर से बाहर ही न निकले हों। यानी ‘बड़े भाई की निगरानी’ से बचना नामुमकिन है।

लेकिन, अश्वेत या दक्षिण एशियाई गहरे रंग के लोगों की पहचान में उतनी सफल नहीं है। यह सांवले और ज्यादा सांवले रंग की महिलाओं के चेहरों और मनोभावों को पहचानने में भी सफल नहीं मानी जा रही है। चुनौती यही है कि पैमाना तय करने में पूर्व अवधारणा से कैसे बचा जाए? साथ ही इसके घोषित इरादे के मुकाबले लोगों की प्रोफाइलिंग ज्यादा महत्वपूर्ण है। साइबर एक्सपर्ट पवन दुग्गल का सवाल है कि डाटाबेस को सुरक्षित रखने के लिए नियमन कानून बनाए बगैर इसे लागू करना जल्दबाजी है। बहरहाल, एनसीआरबी में टेंडर जमा करने की अंतिम तारीख 16 अगस्त थी। अब देखना यह है कि जहां इंटरनेट की पहुंच और रμतार पर ही सवालिया निशान लगते हों,वहां यह सिस्टम कितना कारगर साबित होगा?



 
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