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किरदार बनते रिश्तेदार

15/10/2019

किरदार बनते रिश्तेदार


लिμट से बाहर कदम रखते ही बच्चों के झुंड में घिर गया। बाल मंडली के मुकदमे अक्सर मेरे पास आते रहते हैं। आम दिनों में कई बार कन्नी काटकर निकल जाता हूं। लेकिन इतवार होने की वजह से फुर्सत में था, इसलिए इत्मीनान से रुक गया। जज के बिना कुछ कहे वादी और प्रतिवादी ने अपनी-अपनी दलीलें शुरू कर दी। अंकल ये लोग मुझे गाली दे रहे हैं- फरियादी ने नाराज होकर कहा। बहुत बुरी बात है, किसने गाली दी? अदालत ने सवाल किया। गाली नहीं दी अंकल, ये बहुत खड़ूस है, इसलिए हम लोग इसे चिढ़ाते हैं- बचाव पक्ष की ओर से सफाई आई। नहीं अंकल हमेशा गाली देते हैं, जब देखो फूफा-फूफा बोलते रहते हैं। मेरा सिर चकरा गया। फूफा भी अब गाली हो गई!

मैंने अपने सहकर्मी को अंग्रेजी में कहते हुए सुना‘ही इज माई अंकल’। माई मॉम्स रीयल सिस्टर्स हसबेंड। मैने पूछ लिया- इतना घुमाकर क्यों बता रहे थे। सीधे-सीधे मौसा भी तो कह सकते थे।

अपने तीनों आदरणीय फूफाओं के चेहरे आंखों के सामने घूम गये। नहीं बेटा फूफा गाली नहीं होती, तुमसे किसने कहा? बच्चा चुपचाप खड़ा रहा तो मैने बाकी तीनों अभियुक्तों से पूछा- आखिर तुम लोग इसे फूफा क्यों कहते हो? क्योंकि ये फूफा की तरह रूठता है। फूफा कैसे रूठते हैं? मैने सवाल किया। बचाव पक्ष की तरफ से कोई जवाब नहीं मिला। तब मैंने एक बच्चे से सवाल किया- फूफा कौन होते हैं? इसका जवाब भी नहीं मिला। थोड़ी देर बाद एक बच्चा बोला- मुझे मालूम है, बुआ के हसबेंड को कहते हैं। तो क्या तुम्हारे फूफा भी रूठते हैं? अंकल मेरी तो कोई बुआ ही नहीं है। लेकिन पापा कहते हैं- कुछ लोग दूल्हे के फूफा की तरह रूठते हैं। बेटा इस तरह अपने किसी दोस्त को चिढ़ाना अच्छा बात नहीं है। जाओ खेलो। ये लोग तुम्हें फिर से चिढ़ायें तो मुझे बताना, मैं पिटाई कर दूंगा- इस तरह अदालती कार्रवाई खत्म हुई। लेकिन मैं एक गहरी सोच में डूब गया।

हम जिस नई दुनिया में जी रहे हैं, वहां नाते तेजी से खत्म होते जा रहे हैं और रिश्तेदार महज किरदार बनते जा रहे हैं। महानगरों की नई पीढ़ी के शादीशुदा लोगों में ज्यादातर ऐसे हैं, जो या तो अपने माता-पिता की इकलौती संतान हैं या फिर बमुश्किल उनके एक भाई या बहन हैं। जाहिर है, ऐसे लोगों के बच्चों को तमाम रिश्तेदारियों का पता होना असंभव हैं। हमारी कॉलोनी में जिन बच्चों के मामा हैं, उनके चाचा नहीं है। जिनकी बच्चों की बुआ हैं, उनकी मौसी नहीं हैं। मेरे खुद के बच्चों के मामा नहीं हैं क्योंकि मेरी पत्नी का कोई भाई नहीं है। हालांकि हमारी सामाजिकता इतनी है कि दूर के रिश्तेदारों से भी मिलना होता रहता है। लिहाजा मेरे बच्चे यह जानते हैं कि मौसा और फूफा टीवी सीरियल के किरदार नहीं, बल्कि जीते-जागते रिश्तेदार होते हैं। लेकिन उनके ज्यादातर दोस्तों को ऐसे तमाम रिश्तों का पता नहीं है। अंग्रेजी का एक बहुत प्यारा सा शब्द है- अंकल।

नई पीढ़ी वालों के लिए यह शब्द काफी सुविधाजनक है। मामा, मौसा, चाचा और फूफा के चक्कर में पड़ने की कोई जरूरत ही नहीं है। एक ही संबोधन में सारे निपट जाते हैं। भारत में अंकल एक किस्म का औपचारिक संबोधन है। अपने रक्त संबंधियों को अंकल कहकर बुलाएंगे तो वे बुरा मान सकते हैं। लेकिन अब अंकल की स्वीकार्यता बढ़ती जा रही है क्योंकि जो थोड़े बहुत रिश्ते बचे हैं, वे भी औपचारिक होते जा रहे हैं। मैंने एक दिन अपने किसी सहकर्मी को अंग्रेजी में कहते हुए सुना- ही इज माई अंकल। माई मॉम्स रीयल सिस्टर्स हसबेंड। मैने उनसे अकेले में पूछ लिया- इतना घुमाकर क्यों बता रहे थे। सीधे-सीधे मौसा भी तो कह सकते थे। उन्होंने जवाब दिया- बचपन से हम अंकल ही बुलाते हैं। अब हिंदी में रिश्ते का क्या नाम, यह पता नहीं। सहकर्मी महोदय का जीवन दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के साथ दक्षिण मुंबई के सुपर पॉश इलाके में गुजरा है।

फिर भी मौसा या उसके किसी समानार्थी भारतीय शब्द से उनका परिचय ना होना मेरे लिए किसी सदमे से कम नहीं था। वक्त के साथ रिश्ते-नाते पूरी दुनिया में बहुत तेजी से और विचित्र तरीके से बदल रहे हैं। अमेरिका का मशहूर किस्सा है- पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा किसी स्कूल के दौरे पर गये थे। वहां बच्चो से बातचीत हो रही थी। किसी समलैंगिक जोड़े द्वारा गोद ली लिये बच्चे ने शिकायत की- मेरे दो-दो पापा हैं लेकिन मम्मी एक भी नहीं। ओबामा बुरी तरह चकराये और फिर उन्होंने संयत स्वर में जवाब दिया- वे जो भी हों लेकिन ज्यादा बड़ी बात यह है कि वे तुम्हें प्यार करते हैं। क्या हम भारत में भी कुछ ऐसा ही होते देख रहे हैं? महानगरीय जीवन में तो इसके लक्षण पूरी तरह से दिखाई देने लगे हैं।


 
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