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सर्वव्यापी राम और रामलीला

14/10/2019

सर्वव्यापी राम और रामलीला

विजय कुमार राय

रामायण से हमें मर्यादा, नैतिकता, सुशासन, ज्ञान, युद्धकला, आदि की समझ मिलती है। विषम परिस्थिति में मर्यादित और आदर्श जीवन जीने की सारगर्भित शिक्षा से रामायण ओतप्रोत है।

हिन्दू महाकाव्य रामायण विश्व की सर्वेश्रेष्ठ रचनाओं का अद्वित्तय उदाहरण है। सामान्यरूप से रामायण में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की कथा है। इसलिए एक वर्ग रामायण को केवल धार्मिक पुस्तक के नजरिये से देखता है। लेकिन इसके उलट रामायण में व्यक्तिगत, सामाजिक और राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान मौजूद है। यानी रामायण जीवन की सतरंगी शैली का संग्रह है। इसके मंचन की हजार शैलियां हैं। हर काल, देश और स्थान के अनुसार रामायण के मंचन की नई शैली से परिचय होता रहता है। पिछले महीने दिल्ली के कमानी सभागार में पांचवां अंतरराष्ट्रीय रामायण महोत्सव मनाया गया। इस दौरान विभिन्न देशों से आई मंडलियों ने रामायण का मंचन किया।
जब फिजी से आयी मंडली ने हिन्दी में रामायण का मंचन प्रस्तुत करना शुरू किया तो वहां मौजूद लोग मंचन देखकर चकित रह गए। उनकी परिष्कृत भाषा ने दर्शक दीर्घा में बैठे लोगों को भाव विभोर कर दिया। वह उत्सव का आखिरी दिन था। फिजी से आए सभी कलाकार वहां के श्री सत्संग रामायण मंडली नामक समूह से जुड़े थे। मंडली के अध्यक्ष अखिलेश नरेन्द्र प्रसाद से बात की तो उन्होंने बताया कि रामायण हमारे पूर्वजों की देन है। 1879 में जब गिरमिटिया मजदूरों को फिजी लाया गया था तो उनके जीवन में संघर्ष बहुत था।
वे आत्म-शक्ति को बनाए रखने और अपने मनोरंजन के लिए रामलीला करते थे। उन्होंने बातचीत के क्रम में कहा कि तब बहुत तरह की विषमताएं और अभाव था। सामाजिक-आर्थिक संकटों से जूझते हुए हमारे पूर्वज फिजी में डटे रहे। दिन-रात कठिन परिश्रम करते और आत्मिक सुख-शान्ति के लिए रामलीला करते थे। दोहे और चौपाइयां गाते थे। या यूं कहे रामायण के भरोसे ही अपना जीवन गुजार रहे थे। नरेन्द्र प्रसाद की माने तो फिजी के गांव-गांव में रामायण की मंडली बनी। आज फिजी में दो हजार से ऊपर रामायण का मंचन करने वाली मंडलियां हैं।
सभी अपने ढंग से रामलीला करते हैं, जिसमें परिवार का हर सदस्य हिस्सा लेता है। हर हμते मंगलवार के दिन रामायण पाठ होता है। उन्होंने कहा- हम लोग 25 साल से रामलीला कर रहे हैं। सच बात तो यह है कि रामायण पढ़-पढ़कर ही मैंने हिन्दी सीखी है। आज बेशक हिन्दी लिखने में कठिनाई होती है, लेकिन बोलना, पढ़ना अच्छी तरह आता है। इस तरह हम लोग अपने पूर्वजों की संस्कृति को बनाए रखने के प्रयास में जुटे हैं। भारतीय धर्म ग्रंथों में रामायण का स्थान सबसे ऊंचा है।


शायद ही कोई हिन्दू परिवार होगा, जिनके घर में रामचरितमान की प्रति न हो। इसी क्रम में बीते दिनों रामलीला के मंचन का अनूठा संगम दिखने को मिला, दिल्ली में मंडी हाउस के निकट स्थित कमानी आॅडिटोरियम में (17 से 19 सितंबर)में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद की ओर से पांचवां अंतरराष्ट्रीय महोत्सव मनाया गया। महोत्सव में आठ देशों से आई नाट्य मंडलियों ने हिस्सा लिया। इनमें थाईलैंड, त्रिनिदाद, टोबैगो, इंडोनेशिया, कंबोडिया, श्रीलंका, मॉरिशस, बांग्लादेश और फिजी के कलाकार शामिल हुए। सभी देशों से आए कलाकार उत्साह से भरे थे। अंधेरे हॉल में सभी की नजरें मंच पर टिकी रहती थी। शांत हॉल में अचानक बिजली चमकती है।
बादलों की गड़गड़ाहट की आवाज आती है और मंच की काली घनी छाया के बीच से लाल- नीली-पीली रोशनी की किरणों के बीच रामायण का दृश्य अविस्मरणीय और अद्भुत था। फिर भगवान राम की कथा शुरू होती है। इसी तरह लगातार तीन दिनों तक यह दृश्य और मंचन की अनेक शैलियां दर्शकों को भाव विभोर करती रहीं। तीन दिनों तक चलने वाले रामायण महोत्सव कार्यक्रम का उद्घाटन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने किया। इस अवसर पर अमित शाह ने कहा कि सभी को अपने जीवन में रामायण के मूल्यों को आत्मसात कर एक आदर्श इंसान बनने का प्रयास करना चाहिए। रामायण सदियों पुरानी भारतीय संस्कृति का खजाना है।
दुनिया की सभी समस्याओं का समाधान रामायण में मौजूद है। उन्होंने कहा कि रामायण केवल एक चरित्र की घटना नहीं है। बल्कि मानवीय जीवन की सारी ऊंचाइयों को भूले बगैर जीवन को रेखांकित करने का काम महर्षि वाल्मीकि ने किया है। उन्होंने बताया कि यह कार्यक्रम 2015 में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के कार्यकाल में शुरू हुआ था। उस समय सात देशों यानी इंडोनेशिया, फिजी, त्रिनिदाद, टोबैगो, कंबोडिया, मलेशिया, थाईलैंड की नाट्य मंडलियों ने हिस्सा लिया था। इस बार रामायण के मंचन में हर समुदाय और विशेषकर युवा वर्ग की अच्छी भागीदारी दिखी। एक ओर जब यह मान्यता प्रबल हो रही है कि हम पाश्चात्य संस्कृति की तरफ तेजी से आकर्षित हो रहे हैं तो ऐसे उत्सवों में युवाओं की भागीदारी नई उम्मीद पैदा करती है।
रामायण उत्सव में युवाओं की उपस्थिति इसका संदेश है कि भारतीय संस्कृति की हमारे भीतर गहरी पैठ है। जरूरत है तो उसका उत्सव मानाने की। नई पीढ़ी का पारंपरिक भारतीय नृत्य, संगीत, नाट्य आदि की तरफ आकर्षित होना सुखद संतोष का विषय है। रामायण का मंचन देखने आधुनिक पोशाक में आई एक महिला ने कहा कि वह देवियों में मां दुर्गा की भक्त है और मर्यादा पुरुषोत्तम राम के जीवन से प्रभावित है। बहरहाल, फिजी से आई रामलीला की टोली में सभी लोग अलग-अलग पेशे से जुड़े हैं। अपने रोजमर्रा के काम से समय निकालकर संस्कृति के संरक्षण के कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। रावण की भूमिका निभाने वाले सचिन से भारत-फिजी के संबंधों के बारे में बात की तो उन्होंने कहा कि भारत की तरह वहां भी रामायण आपको घर-घर में मिल जाएगा। हर कोई उसका पाठ करता है। लेकिन, आजकल इसका चलन कम हो रहा है। हम इस परंपरा को फिर से जीवित करना चाहते हैं।
इसलिए रामायण के मंचन के जरिए सबको आकर्षित कर प्रेरित कर रहे हैं। सचिन ने कहा कि हम जब भी यहां आते हैं तो अपनत्व के भाव से लोग देखते हैं। हमें यहां बाहरी होने का एहसास नहीं होता है। इसका कारण फिजी में बसा मिनी-इंडिया है। वैसे तो मैं बैंक कर्मचारी हूं, लेकिन यह काम मुझे पसंद है। उत्सव में बांग्लादेश से आई नाट्य मंडली ने भी अपनी सुंदर प्रस्तुती से मन मोह लिया। इस रामायण मंडली का नाम कृपासिंधु कुशनगान था। जिसका निर्देशन अनुप चटर्जी कर रहे थे। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश का यह समूह तीस साल पुराना है। इसे शिखर पर पहुंचाने वाले कलाकार किसान हैं। वे खेती करते हैं और समयानुसार रामलीला भी करते हैं। यह रामलीला वाल्मीकि और बंगाली भाषा के कवि किट्टीबार ओझा के काव्य पर आधारित है।
यह समूह रामायण के उत्तरकांड को दर्शाता है, जिसमें माता सीता अपने दोनों बेटे लव- कुश के साथ जंगल में निर्वासन का जीवन व्यतीत करती हैं। पूरी कहानी को लोक नृत्य संगीत के साथ गायन विधा में प्रस्तुत किया जाता है। कंबोडियाई कलाकारों ने भी लव- कुश कथा को सुंदर रूप में प्रस्तुत कर मननोह लिया। कुल मिलाकर सभी देशों के कलाकार नवीनता के साथ विभिन्न शौलियों में रामायण की कथा का प्रस्तुतिकरण किया। जो भारतीय संस्कृति की वैश्विक स्वीकृति का जीवंत उदाहरण है।


 
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